जनजातीय विकास में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की भूमिका - एक अनुशीलन कांकेर जिले के विशेष संदर्भ में
प्रो. आर. प्रसाद1, प्रीति वैष्णव2
1प्रोफेसर, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छ.ग.।
2मनसेवी सहा. प्राध्यापक, अर्थशास्त्र विभाग, भानुप्रताप देव शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कांकेर, छ.ग.।
बैंक क्रियाओं के अभाव में आर्थिक विकास का मार्ग रूक जाता है। इसलिए बैंकिंग व्यवस्था को आर्थिक जगत का प्राण कहा जाता है।
अध्ययन क्षेत्र कांकेर जिला है जो कि जनजातिय बाहुल्य जिला है, अतः अध्ययन से यह ज्ञात करने का प्रयास किया गया है कि छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक जनजातियों के विकास में कितना योगदान रखता है, इससे उनके व्यवसाय, रोजगार, आय तथा जीवन स्तर में क्या प्रभाव पड़ा है। बैंक द्वारा संचालित योजनाएं लाभार्थियों के लिए कितनी उपयोगी सिद्ध हो रही है।
छत्तीसगढ़ में बैंक की शाखाएं :-राज्य में बैंक की कुल 249 शाखाएं कार्यरत है, जिसमें से 205 शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, 26 अर्धशहरी क्षेत्रों में तथा 18 शाखाएं शहरी क्षेत्र में हैं। कांकेर जिले में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की 14 शाखाएं कार्यरत हैं।
जनजातिः-
भारतीय समाज विभिन्न प्रजातीय समूहों का संगम स्थल रहा है। समय - समय पर भारत ने विभिन्न समुदाय प्रवेश करते रहे हंै लेकिन कालान्तर में ऐसे सभी समूहों की सांस्कृतिक परम्परायें भारतीय समाज का अंग बन गई। इसके पश्चात् भी इनमें अनेक मानव समूह ऐसे थे जिन्होनें बाह्य सभ्यता के कुछ तत्वों को ग्रहण करने के पश्चात् भी अपनी मौलिक सांस्कृतिक विशेषताओं को नष्ट नहीं होने दिया। साधारणतः ऐसे समूहों को ही हम ‘जनजाति’ के नाम से संबोधित करते हैं।
जनजातीय विकास:- विकास एक कठिन और सतत् (33) चलनेवाली प्रक्रिया का नाम है। जिसके अंतर्गत सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विभेदीकरण, आर्थिक उत्पादन तथा उच्च जीवन यापन के ढंग प्रजातांत्रिक सहभागिता आदि बातों को हम शामिल करते हैं। सामाजिक परिवर्तन के दो रूप हो सकते हैं - 1. गुणात्मक परिवर्तन हो सकता है। 2. संख्यात्मक परिवर्तन हो सकता है।
मानव जीवन की गुणात्मक वृद्धि को हम विकास कहते हैं। विकास का एक प्रारूप होता है उस प्रारूप का कुछ आधार होता है। उस प्रारूप की जब तक हम आलोचना नहीं करते हैं तब तक हम उसको बदलने की नहीं सोच सकते।
परिवर्तन एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। हर समाज में हर समय परिवर्तन तो होता रहता है लोग कहते हैं जनजाति बदलने की चीज नहीं है अथवा जनजातियों की जो व्यवस्था है वह अपरिवर्तित हैं। विकास के संबंध में दो बातें हैं - 1. एक तो वे विकास स्वयं करें। 2. उनका विकास करवाया जाये।
षोध प्राविधि ;त्मेमंतबी डमजीवकवसवहलद्धः- चूंकि शोध विषय ‘छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक का जनजातीयविकास पर पड़ने वाले प्रभावों का अनुशीलन’ हैं अतः यह अध्ययन ग्रामीण बैंक एवं जनजातीयों के विकास के मध्य अन्तरसंबंधों तथा बैंकों में जनजातीय योजनाओं के प्रभावों का अध्ययन है, अतः अध्ययन के निम्न उद्देश्य है:-
अध्ययन का उद्देष्य (व्इरमबजपअम व िजीम ैजनकल):-प्रस्तुत अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य है:-
1 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक एवं जनजातीय विकास के मध्य पारस्परिक संबंधों की जांच करना।
2 अध्यायित जिले में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की शाखाओं का पता लगाना।
3 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक के माध्यम से प्रदान किये जाने वाले ऋणों के प्रकार एवं विभिन्न योजनाओं को चिन्हित करना।
4 बैंक की विभिन्न योजनाओं एवं भिन्न - भिन्न कार्यो के लिए दिए जाने वाले ऋण की प्रकृति (छंजनतम व िजीम सवंद) का अध्ययन करना।
5 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंकों के माध्यम से न्यादर्शियों में रोजगार, आय एवं जीवन-स्तर का पता लगाना।
परिकल्पना ;भ्लचवजीमेपेद्ध:- प्रस्तुत अध्ययन में निम्न परिकल्पनायें समाहित हैं-
1 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक एवं जनजातियों के विकास के मध्य सीधा सम्बन्ध होता है।
2 ग्रामीण बैंक की साख योजनाओं से इनके रोजगार आय में वृद्धि होती हैं।
3 साख योजनाओे के क्रियान्वयन से न्यादर्श परिवारों के विभिन्न क्षेत्रों मे (जैसे कृषि, व्यवसाय आदि) में रोजगार, आय तथा उनके जीवन स्तर में वृद्धि होती है।
प्राविधि ;डमजीवकवसवहलद्ध:-
1 अध्ययन क्षेत्र ;थ्पमसक ।तमंद्ध:- प्रस्तुत अध्ययन का क्षेत्र जनजातीय जिला उत्तर बस्तर (कांकेर) हैं, अध्ययन हेतु जिले की तीन तहसीलों का चयन यादृच्छिक रूप से किया गया हैं। ये तहसीलें कांकेर, चारामा तथा नरहरपुर हैं।
2 न्यादर्ष चयन ;ैमसमबजपवद व िैंउचसमद्ध:- अध्ययन हेतु अध्यायित जिले के 3 न्यादर्श बैंक एवं 15 न्यादर्श ग्रामों का चयन किया है।
कुल सर्वेक्षित न्यादर्श परिवारों की संख्या 320 हैं, जिसमें से अनुसूचित जनजाति परिवारों की संख्या 149 हैं जिसका प्रतिशत 46.56 है। इस प्रकार सर्वेक्षित कुल न्यादर्श परिवारों की संख्या में अनुसूचित जनजाति परिवारों की संख्या सर्वाधिक है इसका कारण अध्यायित जिले का जनजाति बाहुल्य जिला होना है
न्यादर्श परिवार तथा उनका व्यवसाय -
अध्यायित न्यादर्शियों द्वारा ऋण लिया जाता हैं जिनमें से कुछ न्यादर्श कृषि कार्य, नौकरी, किराना दुकान/पान ठेला/अन्य दुकानें व्यवसाय करते हैं जिनका विवरण निम्न तालिका में किया गया हैं-
इस क्षेत्र में कृषि से जुड़े न्यादर्शियों का 63 प्रतिशत हैं, जिनके आय का साधन कृषि हैं, अतः यहां की कृषि को उन्नत बनाने में बैंकों का महत्पूर्ण योगदान निभाना होगा तभी इनका विकास होगा।
चयनित योजनाएं एवं न्यादर्श परिवार -
उपरोक्त योजनाओं में से कुल सात योजनायें यादृच्छिक रूप से चयनित की गई जो निम्नानुसार हैं, जो कुल योजनाओं का 46.67 प्रतिशत हैं तथा न्यादर्शियों को चार श्रेणियों - सीमांत कृषक, लघु कृषक, मध्यम कृषक तथा वृहद् कृषकों में बांटा गया है।
अध्ययन से ज्ञात होता है कि अध्यायित क्षेत्र में न्यादर्श सीमांत कृषकांे की संख्या सर्वाधिक 129 (40.31 प्रतिशत) हैं, लघु कृषकों की संख्या 121 (37.81 प्रतिशत) हैं, मध्यम कृषकों की संख्या 42 (13.12 प्रतिशत) हैं, तथा सबसे कम वृहद् कृषकों की संख्या 28 (8.75 प्रतिशत) हैं।
न्यादर्श परिवारों द्वारा किसान क्रेडिट कार्ड योजना का प्रयोग सर्वाधिक 67.81 प्रतिशत किया जा रहा हैं, क्योंकि जिले की सर्वाधिक जनसंख्या कृषि कार्य कर रही है तथा उनके आय का साधन कृषि है अतः ‘‘किसान क्रेडिट कार्ड योजना’’ से उन्हें आसानी से कृषि कार्य हेतु आवश्यक (बीज, खाद, दवाई, मजदूरी तथा आकस्मकि खर्च हेतु 20 प्रतिशत अनशंगी व्यय भी दिया जाता है) सभी आदाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं जिससे उनका कृषि कार्य बिना रूकावट के हो जाता है।
विभिन्न योजनाओं का लागत, उत्पादन तथा आय पर प्रभाव -
किसान क्रेडिट कार्ड योजना से संलग्न लाभार्थियों की ऋण लेने के पूर्व तथा पश्चात् उनकी कुल वास्तविक आय में कितनी वृद्धि होती हैं। ऋण लेने के पूर्व सीमांत कृषकों की कुल वास्वतिक आय रू. 3820 थी जो ऋण लेने के पश्चात् रू 5000 हो गई इस प्रकार उनकी कुल वास्तविक आय में रू. 1180 की वृद्धि होती हैं। लघु कृषकों की वास्तविक आय में होने वाली वृद्धि पूर्व की तुलना में 2840 रू. हैं, जो सीमांत कृषकों की तुलना में 1660 रू. अधिक हैं। इन दोनों वर्गो की तुलना में मध्यम तथा वृहद् कृषकों की आय में दृगनी वृद्धि पाई गई हैं जिसका कारण इनके पास प्र्याप्त भूमि के साथ ही साथ कृषि हेतु आवश्यक इनपुटस् की पर्याप्त उपलब्धता है। इस योजना के माध्यम से सभी वर्गो के कृषकों की आय में वृद्धि हुई हैं।
कृषि कार्य हेतु शाकम्भरी योजना के तहत् सिंचाई साधनों के उपयोग के परिणामस्वरूप सीमांत कृषकों की वास्तविक आय में ऋण लेने के पूर्व की तुलना में 5985 रू. की वृद्धि हुई जो लोगों की आय में होनी वाली वृद्धि को प्रदर्शित करती है जिससे निश्चित् रूप से उनके आय स्तर में बढ़ोत्तरी हुई हैं। इस योजना से वृहद् कृषक नहीं जुड़े हुये हैं क्योंकि वे अपनी सिंचाई से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति कृषि सावधि ऋण योजना के तहत् पूरी कर लेते हैं।
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना से जुड़े हुये लाभार्थियों की संख्या 8 हैं। इनमें से 7 न्यादर्श सीमांत कृषक श्रेणी के अंतर्गत तथा 1 कृषक लघु कृषक श्रेणी से है। इस योजना में जुड़ने से पूर्व ये न्यादर्श कृषि तथा मजदूरी का कार्य कर अपना जीवन यापन करते थे। इस योजना से जुड़ने के पश्चात् इनकी मासिक आय रू. 2000-3000 तक निश्चित होती है।
व्यवसाय समृद्धि योजना में संलग्न लाभार्थी इस योजना से संलग्न होने से पूर्व कृषि कार्य करते थे। जिससे प्राप्त आय उनकी लागत से थोड़ी अधिक होती थी जिसमें उन्हें अपनी मेहनत के अनुरूप आय प्राप्त नहीं होती थी। इस योजना का लाभ लेने वाले न्यादर्शो की संख्या 31 हैं इनमें से 11 लार्भािर्थयों के द्वारा किराना दुकान चलाया जा रहा हैं तथा इन्हें रू. 3000-5000 तक शुद्ध मासिक आय प्राप्त होती है। 6 लाभार्थियों के द्वारा पानठेले की दुकान चलाई जा रही है जो रू. 1500 से 2000 तक शुद्ध मासिक आय प्राप्त कर लेते हैं। सीमांत कृषक वर्ग के 2 लाभार्थियों के द्वारा सिलाई कार्य हेतु ऋण लिया गया परंतु इनको प्राप्त होने वाली मासिक आय रू. 500 से 1000 के मध्य ही है क्योंकि गांवों में इन्हें कम सिलाई मिलती है एवं सिलाई का मूल्य भी काफी कम रहता है। 12 लाभार्थियों द्वारा जनरल स्टोर की दुकान खोली गई हैं, जो पहले सिर्फ कृषि कार्य करते थे इस व्यवसाय को अपना कर ये रू. 5000 से 10000 तक शुद्ध मासिक आय प्राप्त कर रहें है तथा अपने आय से काफी संतुष्ट है।
कृषि संबंधी क्रियाकलाप योजना से जुड़े लाभार्थियों की संख्या 18 हैं इसके पूर्व ये सभी न्यादर्शी कृषि तथा मजदूरी कार्य कर आय प्राप्त करते थे। इस योजना से जुड़ने के पश्चात् भी इनकी आय मंे वृद्धि नहीं हो पाई अर्थात् इनके द्वारा अपनायें गये क्रियाकलापों में इन्हें हानि हुई है। इस योजना के तहत् डेयरी के अंतर्गत दूध उत्पादन हेतु 6 न्यादर्शियों ने द्धण लिया इन्होने बताया कि शुरूवात में तो इन्हे रू. 2000 से 3000 तक आमदनी हो जाती थी परंतु 2 न्यादर्शियों की गांयों ने 6 माह पश्चात् दूध देना कम कर दिया, 3 न्यादर्शियों में से 2 के बछड़े मर जाने के कारण उसने दूध देना बंद कर दिया तथा 1 गाय की बीमारी के कारण अकाल मृत्यु हो गई, मात्र एक न्यादर्श द्वारा वर्तमान में भी यह कार्य किया जा रहो है परंतु वह भी गांवों में दूध की कीमत कम होने के कारण अपनी आय से संतुष्ट नहीं हैं। इस प्रकार इस योजना से जुड़े सभी न्यादर्शियों को किसी न किसी कारणवश हानि उठानी पड़ी हैं।
अनुसूचित जनजाति वर्ग के कुल 46.56 प्रतिशत न्यादर्श में से 65.10 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आय से संतुष्ट हैं, 30 प्रतिशत जनसंख्या असंतुष्ट हैं तथा 14.76 न्यादर्श ने इसका कोई जवाब ही नहीं दिया कि वे अपनी आय से संतुष्ट हैं अथवा नहीं क्योंकि गांवों में लोग अपनी आय के संबंध में किये गये प्रश्नों का जवाब देना नहीं चाहतें। इसी तरह सामान्य वर्ग के न्यादर्श सर्वाधिक 83.33 अपनी आय से संतुष्ट है, क्योंकि बैंक की योजनाओं के माध्यम से उन्हें पहले की तुलना में अधिक आय प्राप्त हो रही है।
न्यादर्षियों द्वारा ऋण की अदायगी
56.25 प्रतिशत न्यादर्शी ऐसे हैं जो समय पर ऋण अदा करते हैं क्योंकि ये न्यादर्शी जानते हैं कि ये जब समय से ऋण अदायगी करेगे तभी इन्हें आवश्कता पड़ने पर ऋण प्राप्त होगा, जबकि 25.31 प्रतिशत न्यादर्श ऐसे हैं जो देर से ऋण अदा करते है जिससे इनकी ऋण राशि ब्याज के कारण अधिक हो जाती है, ये न्यादर्श ऋण देर से अदा करने के कारणों में फसल का सही समय उत्पादन न होना, घर पर आवश्यक कार्यो हेतु पैसे खर्च कर देना, उत्पाद को बाजार तक ले जाकर न बेच पाना आदि कारण हैं। 18.43 प्रतिशत जनसंख्या ऐसी है जिन्होंने ऋण अदा ही नहीं किया है, ये बताते है कि इनका उत्पादन सही न हो पाने के कारण ये ऋण नहीं अदा कर पाये, कुछ ने अपनी आय को बच्चों की शादी मंे लगा दिया, कुछ ने धनराशि स्वास्थ्य पर खर्च कर दिया जिसके कारण ये ऋण नहीं अदा कर पाये।
निश्कर्श -
प्रस्तुत अध्ययन से निम्न निष्कर्ष ज्ञात होते हैं -
1 छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक तथा जनजातीय विकास में सीधा संबंध पाया जाता है, ग्रामीण बैंकों की स्थापना ही ग्रामीण विकास हेतु कि गई हैं इसलिए इनकी पहुंच गांवों तक होती हैं, कांकेर जिले की 95.18 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है अतः जिले के विकास के लिए इन गांवों का विकसित होना अतिआवश्यक है।
2 अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि बैंक से जुड़ने के पश्चात् जनजातियों के आय, उपभोग तथा जीवन स्तर में सुधार हुआ हैं पहले वे अपनी कृषि हेतु पर्याप्त धनराशि न होने के कारण सही ढंग से कृषि कार्य नहीं कर पाते थे लेकिन अब उन्हें बैंक से पर्याप्त धनराशि प्राप्त होने से इनका उत्पादन सही हुआ तथा जीवन स्तर में सुधार हुआ है।
3 अध्यायित क्षेत्र कांकेर बैंक शाखा के अंतर्गत आने वाले ग्राम बरचेंगोंदी के न्यादर्शियों ने बैंक की उपलिब्ध्यों का बखान करते हुये कहा कि उनके गांवों तक पहुंचने वाली ये पक्की सड़क ग्रामीण बैंक की देन हैं जिन्होंने हमारे क्षेत्र में कलेक्टर की कार्यशाला कराई थी उसी समय कलेक्टर को हमारी तकलीफ महसूस हुई, और उन्होंने हमारे गांव में सड़क निर्माण कराया।
4 अध्ययन से यह तथ्य भी प्रकट हुआ कि वे किसान जो धन के अभाव में कृषि कार्य छोड़कर, दूसरे स्थानों में मजदूरी की तलाश में पलायन करने लगे थे, वे अब किसान क्रेडिट कार्ड योजना से आसानी से धनराशि प्राप्त कर अपने निवास स्थान में रह कर खेती करने लगे है, जो कि एक उल्लेखनीय उपलब्धि कहीं जा सकती है।
5 अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि जो न्यादर्श बैंक द्वारा दिये जाने वाले लाभ को समझ कर उसका उपयोग कर रहे है तथा समय पर ऋण अदा कर रहे, वे साधन सम्पन्न हो गये हैं, जबकि वे कृषक जो समय पर ऋण अदा नहीं करते उनको ब्याज अधिक होने के कारण स्थिति खराब होती जा रही है।
6 ग्रामीण संकोची प्रवृत्ति तथा खबरायें हुए होते हैं इनके प्रति यदि बैंक के अधिकारियों का व्यवहार असहयोगात्मक रहा तो ये बैंक जाने में संकोच करेगे अतः बैंक के अधिकाराआं, कर्मचारियों का इनके प्रति सहयोगात्मक नजरिया होना चाहिए।
संदर्भ:-
1 तिवारी विजय कुमार (2001) - छत्तीसगढ़ की जनजातियां, हिमालया पब्लिशिंग हाउस, ‘रामदूत’ डाॅ. भालेराव मार्ग, गिरगांव, मुम्बाई,, पृष्ठ - 10
2 अग्रिम दिग्दर्षिका (2006) बस्तर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, प्रधान कार्यालय, हाटकचोरा, जगदलपुर, पृष्ठ क्रं. 37-47.
3 अतिरिक्तांक भारतीय अर्थव्यवस्था (2010) प्रतियोगिता दर्पण, उपकार प्रकाशन, 2/11 ए, स्वदेशी बीमा नगर, आगरा, पेज - 154 से 155.
4 चतुर्थ वार्षिक प्रतिवेदन (2009-10) प्रधान कार्यालय,15 रिक्रिएशन रोड, चैबे कालोनी, रायपुर, पृष्ठ 15-16.
5 जिला विकास-पुस्तिका - जिला उत्तर बस्तर - कांकेर, जिला योजना एवं सांख्यिकी कार्यालय, कांकेर (छ.ग.) द्वारा प्रकाशित, वर्ष 2008-09, पृ. क्र. 10.
1 A Gujarat Vidyapeeth (1968) Gujarat Ka Adivaasi, , PP. 3.
2 Elwin V. (1939) The Baiga, London, P. 519.
Received on 16.05.2016 Modified on 21.05.2016
Accepted on 20.06.2016 © A&V Publications all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(2): April - June, 2016; Page 115-120